पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/१०२

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-५ 'बालम' सुझवि कहै सोइ स्याम यन घन, तानु ते न्यारे नहीं फन दिललाति है। तुमही मैं स्याम तुम स्याम ही मैं रमि रही, वादि ही विकल यिहवल भई जाति है ॥२०॥ कर्म को बियापी को है धर्म के समाधि ध्यावे. श्रमुह सुनावै मु तो ब्रह्म ही के नाम को । कैसो जोग जुगति संजोग फैसो फहा जोग, शान की गांठि कैसी ध्यानन को धाम फो। 'आलम । सुकवि इहां,वृन्दाबनचन्द कान्ह, चिन ये चकोर कहौ भान विसराम को। जहाँ रस परस सरस. मुरली की घोर. तहाँ ऊधौ सगुन निगुन कौन काम को ॥२०॥ रचिर, बरन चीर • चंदन चरचि. सुचि, सरदु-को, चन्द चाहि चितहिं धरत हैं। विविध ,बिलास बसि रास ब्रजपति प्यारे, तेई ब्रज बतियां उचित . उचरत हैं। 'बालम मुझवि अब वैसे- फान्ह ऐसे भए, . उत्तहि. लुभाने किधों इतहिं ढरन , हैं। मधुबन वसत - मधुर मुरली की. :धुनि, मधुप फयहुँ माधौ, सुरति 'फरत है ।।२०३|| , -तारनु = नेत्रों की पुतलियां। २-निगुननिर्गुण। .