पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/१०३

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न ty आलम-कोलि पतियां पठाये अन्नपात तो भलै पै होत. ___ यतियनि विरह वितैयो कछु हाँसी है। 'बालम' निरास पैन मुने कौन जोरै नैन. हिये को कठिन ऐसी कौन ब्रजदासी है। ऊयो ये संदेसे जैये वाही चितचोर पै लै. श्रापुन कठिन भये और को विसासी है। यहाँ लों न श्रावै नेकु वाँसुरी सुनाये श्रानि, विनसैगों कहा पाये जो पै अधिनासी है !।२०४।। . अँखियाँ भली जु ऐसे यमुनि धार, नातो ' धारा पल छूटे निहुँ देस न समान है। औधि है जु धूम की उसांस सँधि राखो है सु, ... ' 'नेकु लेत द्यौसह अँध्यारो' होति गति है । 'आलम 'संताप स्वेद सींचियो अधार को हूँ, . झूरी है के देह फिर खेह ज्यों उडाति है।' छाती पै सरीही या दीया की सी भाँति ऊधी, पाती लिखे लेखनी ज्यों बाती वर्ग जाति है ॥२०५।। नरनिजा नट सी-बट कुंज 'पुंज चीथी, . . बन 'घन जहाँ तहाँ प्रानदुपयोगी हैं। सोई रहै ध्यान ऊधौ ज्ञान को न काज कीजै, . . . . ये तो 'ब्रजवासी ब्रजराज के वियोगी हैं। २-ध्यारी-ध्यानावस्थित दशा । २-श्रानंदुपयोगी-शानंद करने के योग्य । ,