पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/११७

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AN लिम-शि- माधी विनु राधिका प्राधिक योधियो ग रही, हारी जारी रहै आपुलरोखीन खेह' में । पिंजर को झलक झलक, झाने सांग धीच, • अगै मन झुमे । तर, मैं भुरै गेह में । रती न रकत रहो 'आलम' नपति ताते, . भोजोई रहत "उर नैननि के .मेह में ।' सोवनि मसूमनि उसाँसनिसों मरी जाति, मासक ते मासाऊ न:माँस रहो देह में ।।२३७॥ । उत्तपनि रतर - रितुपति में सपति अप्ति, ..निसिपति-कर उर ताप सी. गहति है। हरि विनु: खोई । हरपुर : हर-हर 'हडि, ... . . . हीही हारी. हेरि सूधो · मगु न चहति है। 'पालम' नलिन अरु अलिन परम अय.. अंगना के अंग जानो अंगिनि यति है। कहा कहीं. फेहि कहीं कोह की कहानी मोहित कुद्ध फुल कहि काहि फोकिला दहति है ॥२३॥ शुधि कौन, घिधि की जुबिधु सो बधावे याक, . बधुनियधनि को धो पाव ते पता चली। माधो विज्ञ सगो मधुवन 'जानि “मधु मास, ।' 'मोशो धौ लै आयो मधपति की सेनाचली। nurammarrmirrrrrrrrrrommmmmmitaram.armirmirmirrrr-man -१-देह-यत: २-उत्तपनि रत उत्ताप में रत (वयं संतान ) २- दरदर = हर से हरा गया (मास) --पला बाल, गैति।