पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/१४०

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ह! सवयक [ २३ ] नघलो नया नेहनधीन प्रिया नियो:रतिगाडरे लखि भोऊ "मालेमानिंग लुटी अंगिया तन, कंचन श्राम भई छवि कोऊ. पसखोकर कान्हकोत्रकीतिया करसोंकुच धापन झाँगत सांज. देखि मुअंगमा कंजनि मध्य. दुरं माना हंस के सायक दोऊ. बैठे मज प्रिया प्रिय: अंकत' संकात भरि अंक मिलाही' गोल कपाल दिपेइंग चंचल मध्य ते सेते कटाछ.न जाहों कामिनी को.फमनी तन कुंदन रोम की.माल लस हिय माही 'बालम' उपम का भव री:कवरी प्रतिबिम्ब कि स्यामकी छाही [ २८५ ] सैन समै सित सेज समीप सुसोभतं स्यामल गौर को संगम भामिनि भूपन भेष बनी:भरिकोटिक भाव करै भुव-भंगम श्रधरप्पुट-पान; पियूष, के पुंजकुचंपर देत',पियारस संगम "पालमा,सिंधुत यंदन इंदु चळ्या मनासंधि ,सुमेह भुगम . २८६ ] पन के गृह सुन्दर सैन किये जलना नंदलाल रत्तन के फयि 'आलम ये छवि ते न लहै जिन पुंज लये कल यत्तन के तन स्याम के ऊपर सोभित यो लगि फूल रहे सतपत्तन के जहा झाल सरोवर मध्य मनो झलक प्रतिविम्य नछत्तन के mmmmmmxm.inrarirmwww.rrierimen.............................. १- अंकत - परस्पर प्रमष्टि से देखते हैं। २-शवरी-चोटो।