पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/१५७

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२६ आलम केलि . [ ३४४ ] कान्ह वियोग यियोगिनि नारि परै दुख सोचनि नेकु निखूट 'श्रालमा देह सदेह बियोग विरोपि दलै सुख सम्पति लूट त्यों जम श्रीवत आजु कै नीठिह आऊ के ओर दुधानल टूटै इते पर चंद दुखी करै मो फहँ या दुखले सखी कैसे के छूट । ३८५ पिछुरै ते बलबीर धरि न सकति धीर, . " . उपजी . विरह पीर ज्यों जरनि जर की। . समिनि सँभारि आनि ,मलय रगरि लायो. . , तैसी उड़ो अवली कहूँ ते मधुकर फो। वैथ्यो आ गई रेप सेवा संभु जू की . पैट्यो प्राय फुच ग्रीच उड़ि न सकत नीच, , . ., . रहि गई रेख 'सेख' दंत दुहुँ पर की। ' .. मानहु पुरातन. सुमरि धैरः संभु जू सो, ___-मायो सम्परारि रहि गई फोंक सर'को । [ ३४६ ] मारिये को तिय मार के मैं रही मेरे कहे पिक मोरनि मारिदै मारत मंद मुचंद दहे तनु मंदरि मंदि सत्री दिसि पारिदै स्याम धिना फपि आलम' घाम ते कुप मेद सुगंधदि डारिद यारिके देखि परै तनवाती सोनारितू पायरीयारिज यारिदै 1-शिरोपि= विशेष रोप से । २-ग्राउ - आयु-सम्ररि काम । - - - - - - - - - - - - - - -