पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/१६७

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


मालम-फेलि आगतपतिका [ ३७० ] हरि श्रागम की अँगना सुनि चाह सँवारत अंग हुलास हियो कबि 'आलमा भूपन भेप यने छवि कोटिहि मैन को अंगुलियो तिलकद्दुति कुंकुम मध्य ललाट सुचारु जराउ को बिन्दु दियो अनुराग ते जाग जगम्मग मानो सुहाग को भाग प्रकास कियो [ ३७६ ) घर आँगन पैठत साँझ सवारमिलो त्रियाँ अँखियाँ जिय जी सों 'बालम' पान न सैन लखें पियको चितु तीय तिया चितु पीसो पुर योथिनि में मुरली मुनि के चलि श्रावत एक कछु मिस हो सो कान्ह चितै मुसुकाइ इते कछु बोलति है कहि बात सखी सों [ ३० ] घातक सा यरु वैर बढ़ायत बाटहि घाट अनीति सची है ' ताहि सो खेल करो नँद को सुन जाके हिये यह बात खंची है 'पालमा यादिहि दोपु लगे सब कोऊ पाहै यह याहि रची है कांकरियों तु इ.पोलगि छुदै गई देसंत हो कैसे ऑलि यची है