पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/१७

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बालमोति), जसुदा के अजिर बिराजै मनमोहन न . अङ्ग रज लागे छथि छान सुरवात की। छोटे छोटे पाछे पग धुर धुमत बने, जामों चिन हित लागे सोना घालजाल की I • पाली पनियां सुना दिनु छाँडियो न भादै, हाती सो छावै लागै छोह वा दयाल की । । रेरि जनारि हारी वारि फेरि डारी सब, ' पालम चलैया लीजै ऐसे नन्दलाल की ॥३॥ A दधि मधुर धरनि धयो छोरि खैहै, .. घाम. ते निकसि धारी धेनु धाइ खोलिहें । धूरि लोटि ऐहैं लपटहै लटकत ऐहैं, .. सुखद, सुनैहै. वेतु.. वतियाँ अमोलि है । 'आलम' सवारि मेरे ललन चलग सीखें, . पतन की बाँह भ्रम गलिनि .में डोलिहैं । सुदिन मुदिन दिन, ना दिन गनांगो -मा जा.दिन कन्हैया मोहों मैया हि वोलि ||४|| दोरी' कौन सानी दुरि जैरे की सिगरी दिन. . .. .:. धिन न रहत घरै कहीं का कन्हैया फो। पल न परत. फल यिकल जसोदा मैया, · टौर भूले जैसे तलवेली लगै स.फो। - ~ ~ - - - - ~- १-नुराल -इन्द्र। २-जन की गाँह-वजदेव जी का दाय पड़े हुए 1३-ौरी-श्रादस, पान्नि।