पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/२९

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आलम लि कई फयि पालम मुके हैं रोझि घोमि अय. : ____ मानु छाडि घालि तय चोलिये को दाउ है । नाहि किये नाहिं यलि नाहिन मनाई जाति, जेतो नाहि तेती रुचि लिय को मुभाउ है ॥३०॥ माई 'सीरी साँझ भीर गैयाँ छोरि भाई घर, . बन धन पुर घोच परि धूरि धाई है। पालम चहुँधा' चढ़ि रूम्स नि चिरैयाँ बोली, भूपन बने हैं बलि बेरी पनि आई है। पाली तोला चलि जोलोलोली में लपेटोससि. रवि को न छवि छिन जौन्ह ना जनाई है। बाह हूँ के छुल मिलि होहो भई तेरी छाँह.... जो लौ परवाही पर छाही यानि छाई है ॥३२॥ लिये को आई ही सु होही छलि गई मनु, . छोकती न छलु करि पंई विहारीः हो। .. तो चल है 4 आली होहीये प्रचल सी हो, - सादी रूप-रेख देखि रीझि भीजि हारी हो । 'सेख' भनि लाल-मनि बेदी की विदा है ऐसे, :.. , गोरे गोरे माल पर वारि फेरि जारी हो। चैरिनि, न होहु ने वेसरि सुधारि धरी, • हो तो :पलि घेसरि के चेह' वैधि मारी हौं ॥३२॥ Pur १-बेहवेध, सुगन, छेद। " ..:...