पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/३५

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श्रालम-काल-T" 'सेखा कह प्यारीत जौ'जयदी ते बन गई, ' तय हो ते कान्ह अँसुवनिः सर करे हैं। याते डानियति है जू घेऊ नदी नारे नोगा कान्हं घर विकल वियोग रोय भरे है ।।४।। 'तेरी गति देखें गति मति मेरो भूली और, . तैसेई रिया के रोम रोम कलमले हैं। 'पालमा है तो पापी दुहुँ दिसि पैनोई यां, पेम-परसंग के कहूँ ना ढंग भले . हैं । या घरी ते वैसे ही उहाँही उही.. ओर दोठिं, T . { पीठि पलटे :मानों कान्ह . काहू छले हैं। चूर है के चेत्यो केहूँ वाँकी सूधी चालि थाली,rn • तूं तो चलि आई वाके नैना न चले हैं ।।४।। दोहन के भिस तिहि गोहन लगाइ चलो, दोहंनी भुलानी मन मोहनी मयी भयो। 'बालम' कहै हो गुलर गेहविसायों उन, देहऊ सँभाखो नहीं हु ऐसो है नयो । 'सिथिल लिवार से छूटे हुते वार तज ' लगोही किवार झांकि हरि-हरि सो लयो । अधर मुखात बूझे 'आंधियो' न श्रावै. घांत, ___ अधो मुख देखि मन श्राधोआध है गयो ।।४॥ १-तिहि गोहर लगाइ चला उसके निकट गई। ।। २--गुन - हालत, दश। ३--भाधो श्राप - दो टुक्ते, धारल । ":" '