पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/५४

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


मायककीदती . मृग मद पोति झापी नीलघर त जोति,

धूम उरमाई मानो होरी फी सी भारी' है ।

लै चलो हो अँधियारी अंग अंग छमि न्यारी;' पारसी में, दीप की सी दोपति पसारी है। ऊजरो सिंगार सेखा जोन्ह ह को साजु कीतो, । जोन्ह हमें जोन्ह सोलस सुधा सुधारी है। यार पारः कहत ही प्यारी को छपार ल्याउ,' ...: कैसे के छपाऊं परछाहियो उज्यारी है ।११॥ व थोरे मारीझिाराचे प्रेम प्रीति पूरी साँचे,' । ऐसे. रिमवार को गिराइ गई गैन:' ही। प्रोदा नहीं प्यारी सो नबोदा 'लयेली. जानि खेली. एक - 'संग ते सहेलियो कहै नहीं। पौरी खाहु 'सेख' भनि पोरे पोरे होहु जनिं, विरह को' भेदी वाके भूलिई भिदै नहीं। पैन ही मैं कालि कमैन की सी भूरिडारी, . : "मैना ही के रावर सुनाउँ नाते मैं नहीं ॥१२॥ www.mom .indi timirmire १-झारी = लो, लपट । मिलायो = "जाके तन की छाई दिगोम छाएँ सी होत"। (विहारी), २-जैन (गमन) चाल । ३-भेदो- फार में छेद करने का बर्मा। -पाप भी मोम (मैन ) के बने हुए हैं। नममें सनक भी मैं (खुददारी) नहीं है। " ! . . . . . .