पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/७५

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1 *श्रालम कलिT 'शालम' कहै हो भूली मोरहते भोरे' आहे, ' द्वारे झमि झाँकी कान्ह देखि नेक ही लये। लटपटी पेच लखि चटपटी लागी आँग, - - अटपटे आये लाल 'माहिं ल के गये ॥१४॥ यन सो पनिकै बनधारी ब्रज खोरि प्रार, याँसुरी बजाई घाँधे यनिता विकर के। सुनि धुनि धाई वसकाम धामकाम सजि, . रोझे प्रभु 'आलम । यिलोके धार एफ के । उझकि झरोखें फिरि चाहि चली पाली पर " उगि ठौर कानद रहे. टेके 'प्रीति-टेक के । • मकुटी कुटिल चले लोचन, तिरीछे तीने, 'मनु फटि गयो सु-कटाक्ष लागे नेक के ।१४२ आँगन अंगना आँगन ही खरी हों मगन भई छगुनत, .. स्याम अंगनीको वाके संग हीन गौनी में। 'मनहिं मरोरि तोरि चोरि संग डोरि सखी, नयो नेहु जोरि सो री गोरी खोरि कौनी में ! संग १--भोरे श्रादघी से प्राकर। २-बाँध निता विवेक स्त्रियों की विवेक बुद्धि को यों व दिया (विवक शक्ति मार दी)।३--यार: माल । '४-- केतन मे । ५-अगनत-विचार करते हुए।