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पृष्ठ:आल्हखण्ड.pdf/३७०

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लाखनिका बिवाह। ३६९

दीन जबाहिर तहँ चिट्ठीको राजा पढ़नलाग त्यहिबार १०
पढ़िकै चिट्ठी गंगाधरकै टीका तुरत दीन लौटाय॥
तबै जवाहिर मन खिसियाने पहुँचे फेरि कनौजै जाय ११
लागि कचहरी तहँ जयचँदकै भारी लाग राज दरबार॥
आल्हा ऊदन तहँ बैठे हैं बैठे बड़े बड़े सरदार १२
दीन जवाहिर तहँ चिट्ठीको जयचँदआँकुआँकुपढ़िलीन॥
पढ़िकै चिट्ठी वापस दीन्ह्यो हाँहूँ कछू नहीं नृप कीन १३
तबै जवाहिर यह बोलत भा दोऊ हाथजोरि शिरनाय॥
लाखनि क्वाँरे हैं तुम्हरे घर यह हमआयनपतालगाय १४
आयसु पावैं महराजा को तौ हम टीका देयँ चढ़ाय॥
इतना सुनिकै जयचँद बोले तुमते साँचदेयँ बतलाय १५
ब्याह न करिखे हम तुम्हरे घर हाँपर जादू को अधिकाय॥
इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय १६
टीका आयो घर तुम्हरे है राजन लीजै आप चढ़ाय॥
कौन दुसरिहा नृप तुम्हरो है ज्यहिभयकरौ कनौजीराय १७
औरो बोले त्यहि समया मा साँची कहौ बनाफरराय॥
सम्मत सब का जयचँद लैकै तब पण्डितते कहा सुनाय १८
देखो साइति यहि समया मा टीका लीनजाय चढ़वाय॥
सुनिकै बातैं महराजा की पंडित साइति दीन बताय १९
पाख अँध्यरिया तिथि तेरसिऔ फागुन मास सुनो महराज॥
भौंरिन केरी शुभ साइति है ह्वैहैं सुफल आपके काज २०
पै यहि बिरिया शुभ साइति में टीका आप लेउ चढ़वाय॥
इतना सुनिकै महराजा ने महलन खबरिदीन पठवाय २१
खबरि पायकै महरानी ने चौका तुरत लीन लिपवाय॥

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