हज़ार ऐब हों तो भी फ़रासीसी अ़मलदारी से करोड़ दजै
हम उसको बिहतर कहेंगे। फरासीसियों को जहां कहीं और
मुल्क में अ़मल्दारी हुई सिवाय लूट क़त्ल और रअ़य्यत की
तबाही के और कुछ भी सुनने में नहीं आया और अंगरेज़ों
ने जिस जगह कबज़ा किया दिन पर दिन उस को तरक्की होती
गयी जिन लोगों ने फ़रासीस की तवारीख़ पढ़ी है और वहां
वालों के सुभाव से अच्छे वाकिफ़ है कभी हमारे इस लिखने
पर अंगरेजों को खुशामद का शुबहा न करेंगे।
सन् १७५९ में दिल्ली के वलीअह्द आलीगुहर ने अपने बाप १७५९ ई० बादशाह आलमगीरसानी से नाराज़ हो कर अवध क सूबेदार की बहूकावट से बिहार पर चढ़ाई की लेकिन लाइव मीर जाफ़र को मदद को पहुंच गया ।इस लिये वलीअहदको भागना पड़ा। बादशाह ने जो ज़मीदारी कम्पनी को दी थी उस की मालगुजारी तीस लाख रुपये के करीब जगतसेठको सिफारिश से जागीर के तौर पर खिताब के साथ दे कर क्लाइव को अपने अमीरी में शुमार कर लिया। और वलीअ़हद को गिरफ्तारोके लिये शुक्का भी लिख दिया।
सन १७६० में क्लाइव इंगलिस्तान को गया और वहां अपने १७६० ई० बादशाह से बड़ी इज्ज़त के साथ लार्ड का खिताब पाया।
ऐसा दौलतमंद हो कर आज तक कभी कोई यहां से फरंगि-
स्तान को नहीं लौटा। वलीअहद अपने बाप के मारे जाने
पर जब बादशाह हुआ। शाहआलम अपना लकब रक्खा।
फ़ौज ले कर बिहार पर चढ़ा। पटने के साम्हने आ पड़ा।
अंगरेजों ने उसे फिर शिकस्त दी और पीछा किया। मीरवभी
साथ था उरे पर बिजली गिरने से मर गया। मीरजाफर के
दामाद कासिमअलीखांको नीयत बिगड़ी उसने बर्दवान मेदनी.
पुर और चटगांव ये तीन ज़िले और पांच लाख रूपये कम्पनीको
ओर बीस लाख कांसलवालों को देने का करार करके अंगरेजों
को इस बात्तपर राज़ीकर लियाकि मोरजाफर कोतोवह सूबे-
सरी में मोकूफ करें। और कासिमझ लीनां को उस को जगह