पृष्ठ:इन्दिरा.djvu/१०९

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सत्रहवा परिच्छेद

मैंने पूछा―ये सब बातें क्यों होती थी?

उन्होंने कहा―क्या तुम ने सब को सुना है?

मैं―हां सुना है। मैं यों सोचती थी कि मैं तो आप को खून कर के फांसी चढ़ गई; फिर फांसी के बाद तदारुक कैसी?

वे―आज कल को आईन के अनुसार ऐसा हो सकता है।

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अठारहवां परिच्छेद।

'भारी जूआचोरी का बन्दोबस्त!'

उस दिन, दिन रात मेरे प्राणप्यारे अनमने हो सोच में डूबे रहे। और मेरे साथ उन्होंने कुछ विशेष बात चीत न की। वरन मुझे देखतेही वे मेरे मुंह की ओर निहारने लगते। उनकी अपेक्षा मेरे सोच का विषय अधिक था, किन्तु उन्हें सोच में डूबे देख कर मेरे कलेजे में बड़ी पीड़ा होने लगे। मैं अपने दुःख को मन ही में दबाकर उन्हें प्रसन्न करने की चेष्टा करने लगा। भांति भांति की गढ़न की फूल की माला, फूल के गजरे और फूल के गंडे बना बना कर उन्हें पहरानेलगी; तरह तरह के पान लगाये, भांति भांति के सुन्दर पक्कान्न किये; आप रोती थी, तो भी अनेक रस को रसभरी कहानियां कहती थी। मेरे पति कारबारी आदमी थे, सब से बढ़ कर वे कारबार में बहुत जी लगाते थे। यह सोचकर मैंने कारबार की बात छेड़ी; क्योंकि मैं हरमोहनदत्त की कन्या हूं इसलिये