पृष्ठ:इन्दिरा.djvu/१२

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इन्दिरा

तब समझी कि मैं डांकुओं के हाथो पड़ी हूं। तब फिर लज्जा से क्या काम था? बस चट मैं ने पालकी के दोनों द्वार खोल दिये । मैं ने कूद कर भागने की इच्छा ली, परन्तु देखा कि मेरे संग के सबलेाग अत्यन्त कोलाहल करते हुए पालकी के पीछे दौड़े आते हैं। इस लिखे मुझे कुछ भरोसा हुआ, किन्तु शीघ्र ही वह भरोसा मिट गया। उस समय पासवाले अन्यान्य वृक्षों पर से कूदते हुए असंख्य दस्यु दिखाई देने लगे। में कह आई हूं कि जल के किनारे २ वटवृक्ष की श्रेणी है। इन्हीं वृक्षों के नीचे होकर डांकू लोग पापको लिये जाते थे। उन्हीं वृक्षों पर से मनुष्य कूदने लगे। उन लोगों में से किसी के हार में बांस की लाठी और किसी के हाथ में पेड़ की डाल थी।

जनसख्या अधिक देख कर मेरे संग के लोग पीछे छुटने लगे। तब मैं ने नितान्त हताश हो कर मन में सोचा कि कूद पड़ू। किन्तु बाहक लोग इतनी शीघ्रता से जाते थे कि जिन से पालकी पर से कूदने में चोट लगने की संभावना थी। विशेषतः एक डांकू तुझे लाठी दिखा कर बोला कि, "यदि उतरेगी तो सिर फोड़ दूंगा।" बस मैं सन्नाटा मारे बैठी रही।

मैं देखने लगी कि एक दरबान ने बढ़ कर पालकी ला पकड़ी तब एक दस्यु ने उस पर लाठी की चोट की जिस से वह अचेत हो कर भूमि में गिर पड़ा। मैंने फिर उसे उठते न देखा । जान पड़ता है कि फिर वह उठा ही नहीं ।

यह देख मेरे शेष रक्षक भी रुक गये और बाइक डांकू लोग मुझे निर्विघ्नता से ले चले। एक पहर रात तक उन लोगों ने