पृष्ठ:इन्दिरा.djvu/१६

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इन्दिरा

ही कांटे गड़े; बहुतेरी बिछुटी[१] लगीं किन्तु ऐं! सांप ने तो काटा नहीं? तब हताश हो कर मैं लौट आई। भूख प्यास के मारे क्लांत हो गई थी—इसलिये अधिक घूम फिर न सकी और एक स्वच्छ स्थान देख कर बैठ गई। सहसा मेरे सामने एक भालू आ खड़ा हुआ; सोचा कि मैं इसी के हाथों मरूंगी—सो उसे खेद कर मारने दौड़ी। किन्तु हाय! वह बेचारा मुझ से कुछ भी न बोला और वह जाकर एक वृक्ष पर चढ़ गया। वृक्ष के ऊपर से थोड़ी देर पीछे 'भन्न भन्न' कर के हज़ारों मक्खियों का शब्द हुआ। मैंने समझा कि इस वृक्ष पर मधुमक्खियां हैं, भालू भी यह बात जानता होगा; इसी से मधु लूटने के लोभ में पड़ कर उस ने मुझे छोड़ दिया।

थोड़ी रात रहे मुझे ज़रा नींद आ गई, बैठी बैठी पेड़ से उठँग कर मैं सो गई।

चौथा परिच्छेद।

अब कहाँ जाऊं?

जब मेरी नीन्द टूटी, तब काक कोयल बोल रहे थे, और बांस के पत्तों में से टुकड़े टुकड़े होकर आती हुई सूर्य की किरण पृथ्वी को मणि मुक्ताओं से सज रही थी। उजाले में पहिले ही देखा कि मेरे हाथ में कुछ नहीं है, डांकू लोग मेरे हाथ के कड़े आदि सब गहने छीन ले जा कर मुझे विधवा सी बना गये हैं।


  1. लता विशेष, वृश्चिकाली लता।