पृष्ठ:उपहार.djvu/८०

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गम्भीर स्वर में बोली-"जी हां, मैं बैरिस्टर साहब के घर से भागी। पहले जब इन्होंने मुझे गुण्डों से बचाकर अपने घर में आश्रय दिया था, तब मेरे हृदय में इनके लिए श्रद्धा और कृतज्ञताके भाव थे। परन्तु वे धीरे-धीरे घृणा और तिरस्कार में बदल गये। मैंने देखा कि बैरिस्टर साहब की खुद की नीयत ठिकाने नहीं है। वह मुझे अपनी वासना का शिकार बनाने पर तुले हुए हैं। धीरे धीरे वह मुझे हर तरह की लालच दिखाने लगे और धमकियां देने लगे। एक दिन इसी तरह की छीना- झपटी में उन्होंने मेरी यह सोने की जंजीर देख ली थी। इसी लिए चोरी का झूठा इलजाम लगाने का इन्हें मौका मिला। मैं चोरी के डरके मारे कभी जंजीर को गले में नहीं पहनती थी। सदा कमर में खोंसे रहती थी।"



अभियुक्ता का बयान सुनते ही अदालत में सन्नाटा छा गया। किसी को भी उसके बयान में किसी तरह की बनावट न मालूम हुई। बैरिस्टर साहब के प्रति घृणा और अभियुक्ता की ओर सहानुभूति के भावों से दर्शक समाज का हृदय ओत-प्रोत हो गया। सभी दिल से चाहने लगे कि वह छूट जाये । परन्तु कानूनी कठिनाइयों को सोचकर सब निराश-से हो गये। चेन उसकी होते हुए भी भला बेचारी इस बात का सबूत कहाँ से देगी कि चेन उसीकी है।



[ २ ]


सफाई की पेशीका दिन आया। आज तो अदालत में दर्शकों की भीड़ के कारण तिलभर भी जगह खाली न थी। प्रत्येक चेहरेपर उत्सुकता छायी थी। कौन जाने क्या होता है ! "कहीं बिचारी की चेन भी छिने, और जेल भी