पृष्ठ:ऊषा-अनिरुद्ध.djvu/४३

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पुरोहित--बहुत अच्छी है।

वाणासुर--भाग्येश ।

पुरोहित--बहुत अच्छा है।

वाणासुर--लग्नेश!

पुरोहित--बहुत अच्छा है।

वाणासुर--धर्म का ग्रह ?

पुरोहित--वह भी बहुत अच्छा है।

बाणासुर--सौभाग्य ?

पुरोहित--वह भी बहुत अच्छा है।

[नारद का प्रवेश
 

नारद--[स्वगत हंसते हुए] सब अच्छा ही अच्छा है। वाह शुक्लजी महाराज,नारायण, नारायण ।

पुरोहित--महाराज, यह कन्या मनमाना वर पायेगी, और पापको कीर्ति बढ़ायेगी!

नारद--[आग बढ़कर ] नारायण, नारायण ! राजेन्द्र ! आप की पुत्री के जन्म का समाचार सुनकर मेरे हृदय में भी बड़ा आनन्द हुआ है, और उसी आनन्द के कारण इस समय यह आगमन हुआ है।

वाणासुर--पधारिये,पधारिये श्रीनारद जी महाराज, पधारिये। यह सब आपकी कृपा और भगवती पार्वती के वरदान का प्रसाद है। अच्छा देवर्षि जी, आप उचित अवसर पर पधारे, आपभी सरा जन्म-पत्रिका को विचारें।

नारद--हां, हाँ, तो लाइये जन्म-पत्रिका इधर लाइये । [पत्रिका सोलकर देखना] राजन् , कन्या के ग्रह तो अति उत्तम हैं !