पृष्ठ:ऊषा-अनिरुद्ध.djvu/६१

विकिस्रोत से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
(४४)


ऊषा–तो मेरा स्वप्न भी सच्चा होगा। यदि नहीं होगा तो मैं उसे सच्चा करने का प्रयत्न करूंगी। में वीर-बाला हूं। जिस पति को एक बार स्वप्न में वर लिया, उसके ही साथ विवाह करूंगी, और यदि वह न मिला तो जन्म भर कुआँरी रहूंगी। भारत की एक साधारण से साधारण नारी भी जब एक बार किसी पुरुष को अपना पति मान लेती है तो फिर वह जीवन पर्यन्त दूसरे पुरुष का विचार तक मनमें लाना पाप समझती है। फिर मैं तो महाराजा वाणासुर की कन्या हूं। और उमाजी की कृपा से स्वप्न में एक दिव्य पुरुष को वर चुकी हूं। अहा, अब तो वे स्वप्न वाले महापुरुष ही मेरे सर्वस्व है।

*गाना*

मोहिं सपने में दरस दिखाय गयोरे,
मेरो मन मोहन सोहन रसिया।

आउत में सपने हरि को लखि नेसुक्बार संकोच न छोड़ी।
आगेह्वै आड़ेभये "मतिराम" महूं चितयोचित लालच ओड़ी॥
ओठन को रसलेन को आलिरी मेरी गही कर कांपत ठोड़ी।
औरभई न सखी कछु बात, गई इतनेही में नींद निगोड़ी॥

बरजोरी दौरी मैं घर संग,
बौरी मोहिं बनायगयोरे। मोहिं॰॥

पौढ़ी हती पलका पर मैं निशि, ज्ञानरुध्यान पियामन लाये।
लागिगई पलकें पलसों, पल लागतही पल में पियां आये॥
ज्योंही उठी उनके मिलिवे कहं जागि परी पिय पास न आये।
"मीरन" और तो सोयके खोवत, हौं सखि प्रीतम जागिगंवाये॥

सुन्दर सुघर मनोहर प्यारो,
अँखियन बीच समाय गयोरे॥