पृष्ठ:कर्मभूमि.pdf/२२१

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यथार्थ था। उसे खुद अब उस मकान में रहते, अच्छे वस्त्र पहनते, अच्छे-अच्छे पदार्थ खाते ग्लानि होती थी। नौकरों से काम लेना उसने छोड़ दिया। अपनी धोती खुद छाँटती, घर में झाड़ू खुद लगाती। वह जो आठ बजे सोकर उठती थी, अब मुंह-अँधेरे उठती और घर के काम-काज में लग जाती। नैना तो अब उसकी पूजा-सी करती थी। लालाजी अपने घर की यह दशा देख-देख कुढ़ते थे, पर करते क्या? सुखदा का तो अब नित्य दरबार-सा लगा रहता था। बड़े-बड़े नेता, बड़े-बड़े विद्वान् आते रहते थे। इसलिए वह अब बहू से कुछ दबते थे। गृहस्थी के जंजाल से अब उनका मन ऊबने लगा था। जिस घर में उनसे किसी को सहानुभूति न हो, उस घर से कैसे अनुराग होता। जहाँ अपने विचारों का राज हो, वहीं अपना घर है। जो अपने विचारों को मानते हों, वही अपने सगे हैं। यह घर अब उनके लिए सराय-मात्र था। सूखदा या नैना, दोनों ही से कुछ कहते उन्हें डर लगता था।

एक दिन सुखदा ने नैना से कहा--बीबी, अब तो इस घर में रहने को जी नहीं चाहता। लोग कहते होंगे, आप तो महल में रहती है, और हमें उपदेश करती हैं। महीनों दौड़ते हो गये, सब कुछ करके हार गयी; पर नशे बाज़ों पर कुछ भी असर न हुआ। हमारी बातों पर कोई कान ही नहीं देता। अधिकतर तो लोग अपनी मुसीबतों को भूल जाने ही के लिए नशे करते हैं। वह हमारी क्यों सुनने लगे। हमारा असर तभी होगा, जब हम भी उन्हीं की तरह रहें।

कई दिनों से सर्दी चमक गयी थी। कुछ वर्षा हो गई थी, और पूस की ठण्डी हवा आर्द्र होकर आकाश को कुहरे से आच्छन्न कर रही थी। कहीं-कहीं पाला भी पड़ गया था। लल्लू बाहर जाकर खेलना चाहता था--वह अब लटपटाता हुआ चलने लगा था--पर नैना उसे ठण्ड के भय से रोके हए थी। उसके सिर पर ऊनी कनटोप बाँधती हुई बोली--यह तो ठीक है; पर उनकी तरह रहना हमारे लिए साध्य भी है, यह देखना है। मैं तो शायद एक ही महीने में मर जाऊँ।

सुखदा ने जैसे मन-ही-मन निश्चय करके कहा--मैं तो सोच रही हूँ, किसी गली में छोटा-सा घर लेकर रहूँ। इसका कनटोप उतारकर

कर्मभूमि २१७