पृष्ठ:कर्मभूमि.pdf/२२६

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समझ में कदाचित् यह नैना का सरल अनुराग ही था, जिसने उन्हें मौत के मुंह से निकाल लिया लेकिन वह स्वर्ग की देवी! कुछ नहीं!

सुखदा का यह प्रश्न सुनकर, मुसकराते हुए बोले——इसीलिए कि विवाह करके किसी को सुखी नहीं देखा।

सुखदा ने समझा यह उस पर चोट है। बोली——दोष भी बराबर स्त्रियों का ही देखा होगा, क्यों?

शांतिकुमार ने जैसे अपना सिर पत्थर से बचाया--यह तो मैंने नहीं कहा। शायद इसकी उलटी बात हो। शायद नहीं, बल्कि उलटी है।

'खैर, इतना तो आपने स्वीकार किया, धन्यवाद ! इससे तो यही सिद्ध हुआ कि पुरुष चाहे तो विवाह करके सूखी हो सकता है।'

'लेकिन पुरुष में थोड़ी सी पशुता होती है, जिसे वह इरादा करके भी हटा नहीं सकता। वही पशुता उसे पुरुष बनाती है। विकास के क्रम में वह स्त्री से पीछे है। जिस दिन वह पूर्ण विकास को पहुँचेगा, वह भी स्त्री हो जायगा। वात्सल्य, स्नेह, कोमलता, दया इन्हीं आधारों पर यह सृष्टि थमी हुई है, और यह स्त्रियों के गुण हैं। अगर स्त्री इतना समझ ले, तो फिर दोनों का जीवन सुखी हो जाय। स्त्री पशु के साथ पशु हो जाती है, जभी दोनों सुखी होते हैं।'

सुखदा ने उपहास के स्वर में कहा——इस समय तो आपने सचमुच एक आविष्कार कर डाला। मैं तो हमेशा यह सुनती आती हूँ कि स्त्री मूर्ख है, ताड़ना के योग्य है, पुरुषों के गले का बन्धन है और जाने क्या-क्या। बस, इधर से भी मरदों की जीत, उधर से भी मरदों की जीत। अगर पुरुष नीचा है, तो उसे स्त्रियों का शासन क्यों अप्रिय लगे? परीक्षा करके देखा तो होता, आप तो दूर से ही डर गये!

शांतिकुमार ने कुछ झेंपते हुए कहा——अब अगर चाहूँ भी, तो बूढ़ों को कौन पूछता है ?

अच्छा ! आप बूढ़े भी हो गये ? तो किसी अपनी-जैसी बुढ़िया से कर लीजिए न?'

'जब तुम-जैसी विचारशील और अमर-जैसे गम्भीर स्त्री पुरुष में न बनी, तो फिर मुझे किसी तरह की परीक्षा करने की ज़रूरत नहीं रही।

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कर्मभूमि