पृष्ठ:कर्मभूमि.pdf/३१८

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उसने थानेदार से पूछा--महन्तजी की तरफ से कोई खास ज्यादती तो नहीं हुई?

थानेदार ने जैसे इस शंका को जड़ से काटने के लिये तत्पर हो कर कहा---बिल्कुल नहीं हुजूर। उन्होंने तो सख्त ताकीद कर दी थी कि असामियों पर किसी किस्म का जुल्म न किया जाय। बेचारे ने अपनी तरफ से चार आने की छूट दे दी, गाली-गुफ़्ता तो मामूली बात है!

'जलसे पर तकरीर का क्या असर हुआ?'

'हुजूर यही समझ लीजिए, जैसे पुआल में आग लग जाय। महन्तजी के इलाके में बड़ी मुश्किल से लगान वसूल होगा।'

सलीम ने आकाश की तरफ देखकर पूछा--आप इस वक्त मेरे साथ सदर चलने को तैयार हैं?

थानेदार को क्या उज्र हो सकता था। सलीम के जी में एक बार आया कि जरा अमर से मिले लेकिन फिर सोचा, अगर अमर उसके समझाने से माननेवाला होता, तो यह आग ही क्यों लगाता।

सहसा थानेदार ने पूछा--हुजूर से तो इनकी जान-पहचान है?

सलीम ने चिढ़ कर कहा---यह आपसे किसने कहा? मेरी सैकड़ों से जान-पहचान है, तो फिर? अगर मेरा लड़का भी क़ानून के खिलाफ़ काम करे, तो मुझे उसकी तंबीह करनी पड़ेगी।

थानेदार ने खुशामद की---मेरा यह मतलब नहीं था हुजूर! हुजूर से जान-पहचान होने पर भी उन्होंने हुजूर को बदनाम करने में ताम्मुल न किया, मेरी यही मंशा थी।

सलीम ने कुछ जवाब तो न दिया; पर यह उस मुआमले का नया पहलू था। अमर को उसके इलाके में यह तूफान न उठाना चाहिए था। आखिर अफ़सरान यही तो समझेंगे कि यह नया आदमी है, अपने इलाके पर इसका रोब नहीं है।

बादल फिर घिरा आता था। रास्ता भी ख़राब था। उस पर अँधेरी रात, नदियों का उतार; मगर उसका ग़ज़नवी से मिलना ज़रूरी था। कोई तजर्बेकार अफ़सर इस क़दर बदहवास न होता; पर सलीम था नया आदमी।

दोनों आदमी रात-भर की हैरानी के बाद सबेरे मदर पहुँचे। आज

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कर्मभूमि