पृष्ठ:कर्मभूमि.pdf/३३७

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समझा, मैं अभागिनी हूँ। आज मुझे मालूम हो रहा है, वह मेरा परम सौभाग्य था।

समरकान्त एक क्षण तक चकित नेत्रों से सुखदा की ओर ताकते रहे, मानों अपने कानों पर विश्वास न आ रहा हो। इस शीतल क्षमा ने जैसे उनके मुरझाये हुए पुत्र-स्नेह को हरा कर दिया। बोले---इसकी तो मैंने खूब जाँच की, बात कुछ नहीं थी। उसे क्रोध था, उसी क्रोध में जो कुछ मुंह में आया, बक गया। यह ऐब उसमें कभी न था; लेकिन उस वक्त मैं भी अन्धा हो रहा था। फिर मैं कहता हूँ, मिथ्या नहीं, सत्य ही सही, सोलहो आने सत्य सही, तो क्या संसार में जितने ऐसे मनुष्य है, उनकी गरदन मार दी जाती है? मैं बड़े-बड़े व्यभिचारियों के सामने मस्तक नवाता हूँ। तो फिर अपने ही घर में और उन्हीं के ऊपर जिनसे किसी प्रतिकार की शंका नहीं, धर्म और सदाचार का सारा भार लाद दिया जाय? मनुष्य पर जब प्रेम का बन्धन नहीं होता, तभी वह व्यभिचार करने लगता है। भिक्षुक द्वार-द्वार इसीलिए जाता है कि एक द्वार से उसकी क्षुधा-तृप्ति नहीं होती! अगर इसे दोष भी मान लूँ, तो ईश्वर ने क्यों निर्दोष संसार नहीं बनाया? जो कहो ईश्वर की इच्छा ऐसी नहीं है, तो मैं पूछूँगा, जब सब ईश्वर के अधीन है, तो वह मन को ऐसा क्यों बना देता है कि उसे किसी टूटी झोपड़ी की भाँति बहुत-सी थूनियों से संभालना पड़े? यह तो ऐसा ही है, जैसे किसी रोगी से कहा जाय कि तू अच्छा हो जा। अगर रोगी में इतनी सामर्थ्य होती, तो वह बीमार ही क्यों पड़ता।

एक ही साँस में अपने हृदय का सारा मालिन्य उँड़ेल देने के बाद लालाजी दम लेने के लिए रुक गये। कुछ इधर-उधर लगा-लिपटा रह गया हो, शायद उसे भी खुरचकर निकाल देने का प्रयत्न कर रहे थे।

सुखदा ने कहा--तो आप वहाँ कब जा रहे हैं?

लालाजी ने तत्परता से कहा---आज ही इधर से चला जाऊँगा। सुना हैं, वहाँ बड़े जोरों से दमन हो रहा है। अब तो वहाँ का हाल समाचार-पत्रों में भी छपने लगा। कई दिन हुए, मुन्नी नाम की कोई स्त्री भी कई आदमियों के साथ गिरफ्तार हुई है। कुछ इसी तरह की हलचल सारे प्रान्त, बल्कि सारे देश में मची हुई है। सभी जगह पकड़-धकड़ हो रही है।

कर्मभूमि
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