पृष्ठ:कर्मभूमि.pdf/३७

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हींगन, सभी से लाला का व्यवहार है। कोई चीज हाथ लगी और आँख बन्द करके यहाँ चले आये, दाम लिया और घर की राह ली। इस दुकान से बाल-बच्चों का पेट चलता है। काँटा निकाल कर तौल लो। दस तोले से कुछ ऊपर ही निकलेगा; मगर यहाँ पुरानी जजमानी है, लाओ डेढ़ सौ ही दे दो, अब कहाँ दौड़ते फिरें।

अमर ने दृढ़ता से कहा--मैंने कह दिया मुझे इसकी जरूरत नहीं।

'पछताओगे लाला, खड़े-खड़े ढाई सौ में बेच लोगे।'

'क्यों सिर खा रहे हो, मैं इसे नहीं लेना चाहता।'

'अच्छा लाओ, सौ ही रुपये दे दो। अल्लाह जानता है, बहुत बल खाना पड़ रहा है। पर एक बार घाटा ही सही।'

'तम व्यर्थ मुझे दिक कर रहे हो। मैं चोरी का माल नहीं लूँगा, चाहे लाख की चीज बेले में मिले। तुम्हें चोरी करते शर्म भी नहीं आती ! ईश्वर ने हाथ-पाँव दिये है, खासे मोटे-ताजे आदमी हो, मज़दूरी क्यों नहीं करते ! दूसरों का माल उड़ाकर अपनी दुनियाँ और आकबत दोनों खराब कर रहे हो !

काले खाँ ने ऐसे मुँह बनाया, मानो ऐसी बकवास बहुत सुन चुका है और बोला--तो तुम्हें नहीं लेना है ?

'नहीं।'

'पचास देते हो?'

'एक कौड़ी नहीं।'

काले खाँ ने कड़े उठाकर कमर में रख लिये और दुकान के नीचे उतर गया। पर एक क्षण में फिर लौटकर बोला--अच्छा ३०) ही दे दो। अल्लाह जानता है, पगड़ीवाले आधा ले लेंगे।

अमरकान्त ने धक्का देकर कहा--निकल जा यहाँ से सुअर, मुझे क्यों हैरान कर रहा है।

काले खाँ चला गया, तो अमर ने उस जगह को झाड़ू से साफ कराया और अगर बत्ती जलाकर रख दी। उसे अभी तक शराब की दुर्गन्ध आ रही थी। आज उसे अपने पिता से जितनी अभक्ति हुई, उतनी कभी न हुई थी। उस घर की वायु तक उसे दूषित लगने लगी। पिता के हथकण्डों से वह

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