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श्री गोपाल कृष्ण गोखले
 


आपके इस कार्य को अव्यवस्थित चित्तता तथा भीरुता आया है बड़ी निष्ठुरता से आप पर भर्त्सना के वाण बरसाये गये। यहाँ तक कि 'मिलीमार' और खुशामद के इलज़ाम भी लगाये गये। यद्यपि उस समय भी भारत और इंगलैण्ड दोनों ही देशो में ऐसे न्यायशील और दृढ़ विचार के पुरुष विद्यमान थे, जिन्होंने दिल खोलकर आपके इस सत्साहस की सराहना की। स्वर्गीय जस्टिस रानडे ने, जो अपने सुयोग्य और सच्चे शिष्य की गतिविधि को वितृसुलभ स्नेह और उत्सुकता से देख रहे थे, आपके इस प्रकार हृदय-शुद्धि का प्रमाण देने पर प्रसन्नता प्रकट की। पर धन्य है वह उदाराशयता और महानुभावता कि मित्रों और शुभचिन्तकों के दिल को टुकड़े-टुकड़े कर देनेवाले वचन और कर्म आपके उत्साह को तनिक भी घटा न सके। आपने इस फारस कहावत---‘हरेक अर्ज दोस्त मीरसद् नेकोस्त' (मित्र से जो कुछ भी मिले शुभ ही होगा।) का अनुसरण कर सारे निन्दा-अपमान को माथे चढ़ा लिया। ऐसी स्थिति में एक बनावटी देश भक्त अपने देशवासियों को कृतघ्नता का दोषी ठहराता, देश की नाकद्री और बेवफाई का रोना रोता और शायद सदा के लिए सार्वजनिक जीवन से मुँह फेर लेता है पर आप उन देश-भक्तों में नहीं थे। जन्मभूमि का प्रेम और भाइयों की भलाई का भाव आपकी प्रकृति बन गया था। अपनी सहज अध्यवसायशीलता और एकाग्रता से फिर स्वदेश की सेवा में जुट गये और प्रसन्नता की बात है कि वह दिन जल्दी हीं आया कि आपके, भ्रम में पड़े हुए विरोधी अपने आक्षेपों पर लज्जित हुए।

अभी पत्रकारों का क्रोध ठंडा न हुआ था कि बंबई में प्लेग से त्राहि-त्राहि मच गई। लोग लड़के-बाले, घरबार छोड़-छाड़कर भागने लगे। आवश्यक जान पड़ा कि उत्साही देश-भक्त रोगियों की चिकित्सा और सेवा के लिए अपनी जान जोखिम में डालें। जिस आदमी ने सबसे पहले इस भयावनी घाटी में कदम रखा वह श्री गोखले ही थे। जिस तरह, तन्मयता और विनम्रता के साथ अपने प्लेग-प्रतिबन्धक