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मौ० वहीदुद्दीन 'सलीम'
 


प्रचार `जमींदार` से अधिक था। शेष सब पत्र उसके पीछे थे। मौलाना के ज़माने में जमींदार' बड़ी शान से निकलता रहा। अन्त में जब इसका छापाखाना जब्त हो गया तो मौलाना अपने घर चले गये।

*अमर साहित्य-सेवा

हैदराबाद में उसमानिया यूनिवर्सिटी स्थापित होने के पहले एक महकमा दासल तर्जुमा (अनुवाद-विभाग) के नाम से स्थापित किया गया था कि विश्वविद्यालय के लिए पाठ्य-ग्रन्थों का भाषान्तर करे। इसमें सबसे बड़ी कठिनाई पारिभाषिक शब्दों के भाषान्तर में उपस्थित हुई। अनुवादकों के समूह अपनी-अपनी रुचि के अनुसार भिन्न-भिन्न मत रखते थे। कोई निर्णायक सिद्धान्त दिखाई न देता था। मौलाना सलीम चूँकि इस प्रश्न पर बहुत अरसे से सोच-विचार रहे थे, इस लिए बुलाये गये। हैदराबाद पहुँचकर वह परिभाषा की कमेटियों में सम्मिलित हुए और परिभाषा-निर्माण के विषय पर एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ लिखा। इस पुस्तक में मौलाना ने सिद्ध किया है कि उर्दू आर्यफुल की भाषा है, जो लोग अरबी व्याकरण के अनुसार परिभाषाएँ बनाते हैं वह वस्तुतः इस भाषा की प्रकृति के विरुद्ध कार्य करते हैं। इस बात को आपने बहुत ही सबल युक्ति-प्रमाणों से सिद्ध किया है। परन्तु पुराणपन्थी अनुवादकों ने इस पर चारों ओर यह बात फैला दी कि मौलाना अरबी के विरोधी और हिन्दी के पक्षपाती हैं। मौलाना ने इस पुस्तक में बताया है कि आर्य भाषाओं में जो सामान्य नियम हैं वे सब उर्दू में मौजूद हैं। जैसे आर्य-भाषाओं का एक नियम यह है कि दो या दो से अधिक शब्द परस्पर मिलकर समास या संयुक्त पद बन जाते हैं। इसके उदाहरण में अपने उर्दू के बहुत शब्द उपस्थित किये हैं। बताया है कि उपसर्ग (prefix) और प्रत्यय (suefix) के द्वारा शब्दनिर्माण भी आर्य भाषाओं की प्रकृति है। इसके प्रमाण में वह संपूर्ण उपर्सग और प्रत्यय लिख दिये जो हिन्दी, फारसी, तुर्की आदि भाषाओं से उर्दू में लिये गये हैं। यह भी बताया है कि यह