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बद्रुद्दीन तैयबजी
 


और आँखें भी कमजोर हो गई थीं फिर भी उन्होंने पुरुषाचित दृढ़ता के साथ पढ़ाई जारी रखी और अन्त में सफल हुए। हिन्दुस्तान आकर उन्होंने बंबई हाईकोर्ट में वकालत शुरू की।

वकालत का आरंभिक काल उस समय भी कड़ी मेहनत का होता था, और खासकर बंबई में जहाँ बड़े-बड़े नामी वकील पहले ही से अपना सिक्का जमाये हुए थे, अपनी वकालत जमा लेना बद्रुद्दीन के लिए आसान काम न था। पर दस साल के अन्दर ही आप वहाँ के नामी वकीलों की गिनती में आ गये। इसके साथ ही आप देश के महत्वपूर्ण राजनीतिक और आर्थिक प्रश्नों का अध्ययन करते रहे जो हरएक शिक्षित व्यक्ति का कर्तव्य है जो अपने दिल में देश का कुछ दर्द रखता हो और उसकी भलाई चाहता हो। आप अच्छे वक्ता भी थे। राजनीतिक सभाओं में कई मारके की वक्तृताएँ कीं जिनसे वक्तारूप से भी देश में प्रसिद्ध हो गये। आपको भाषण करने का (पहला) मौक़ा १८७९ ई० में मिला जब मैंचेस्टर से आनेवाले माल की चुंगी उठा दी गई है और इस पर रोष-प्रकाश के लिए बंबई में जिम्मेदार व्यक्तियों की ओर से सार्वजनिक सभा की गई। चूंकि बंबई का वस्त्र-व्यवसाय अभी बच्चा था और मैंचेस्टर लंकाशायर से आनेवाले माल का मुकाबला न कर सकता था, इसलिए सरकार ने आरंभ में इस माल पर चुंगी लगा दी थी जिसमें उसका भाव ऊँचा हो जाय और बंबई के माल की खपत हो। परन्तु विलायत के व्यापारी इस कर का बराबर विरोध किया करते थे। उनके विचार से बंबई का वस्त्र-व्यसाय अब इतना पुष्ट हो चुका था कि सरकार की ओर से उसे किसी प्रकार की सहायता मिलने की आवश्यकता न थी। इस मौके पर बद्रुद्दीन ने ऐसी पौढ़ युक्तिसंगत ज्ञानगर्भ वक्तृता की कि आँख रखनेवाले जान गये कि भारत के राजनीतिक आकाश में एक नये नक्षत्र का उदय हुआ।

वह समय भारत की राजनीति में बहुत दिनों तक याद किया जायगा। लार्ड रिपन उस समय हिन्दुस्तान के वायसराय थे जिनसे