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कलम, तलवार और त्याग
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अधिक साधु प्रकृति, सहानुभूति-प्रवण और न्यायशील वायसराय यहाँ नहीं आया। उनका सिद्धान्त था कि बड़े-बड़े राज्य अपनी सेना और शस्त्रास्त्र के बल से नहीं जीवित रहते, किन्तु अपनी न्यायशीलता और अपने क़ानूनों के धर्म-संगत होने के बल पर जीते हैं। उस समय तक हिन्दुस्तान में स्थानीय आत्मशासन की व्यवस्था का अर्थात् म्यूनिसिपल और जिला बोर्डों का जन्म न हुआ था। जिले का वह प्रबन्ध भी जो अब जिला बोर्डों के हाथ में है, जिला मजिस्ट्रेट ही किया करता था। अपने अन्य कर्तव्यों के साथ-साथ शहर की रोशनी, सफाई, सड़कों की मरम्मत, शिक्षा आदि के प्रबन्ध का भार भी उसी पर होता था। स्पष्ट है कि वह इन कर्तव्यों का पालन तत्परता के ‌साथ न कर सकता था, क्योंकि उसे और भी अनेक कार्य देखने पड़ते थे। लार्ड रपन ने लोकल सेल्फ गवर्नमेंट अर्थात् स्थानीय आत्मशासन का क़ानून जारी किया जिसके अनुसार शहर और जिले को प्रबन्ध करनेवाली संस्थाओं की उत्पत्ति हुई। रिपन का उद्देश्य इस क़ानून से यह था कि भारतवासियों को नगर और जिले के प्रबन्ध का अधिकार ‌प्रदान कर उन्हें इस योग्य बनाया जाय कि प्रान्त और देश के प्रबन्ध का भार भी उठा सकें। अब तो ये स्थानीय बोर्ड एक प्रकार से स्वाधीन हैं। अपनी आमदनी और खर्च पर उन्हें पूरा अधिकार है। जनता उसके लिए सदस्य चुनती है। बोर्ड के कर्मचारियों की नियुक्ति सदस्यों के निश्चय से होती है। अध्यक्ष का चुनाव भी बोर्ड ही करती है। हाँ, सरकार इन बोर्डों की कार्य-प्रणाली की निगरानी करती है। इस क़ानून के लिए हमें लार्ड रिपन के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए। यद्यपि अब भी स्थानीय बोर्ड कभी-कभी सरकार के कोप-भाजन हो जाते हैं, पर आम तौर से वह उनके कार्यों में दखल नहीं देती।

लार्ड रिपन ही के समय अलबर्ट-बिल भी पास हुआ। इस क़ानून में हिन्दुस्तानी अफ़सरों को अँग्रेजों को दण्ड दे सकने का अधिकार दिया गया था। उस समय तक उन्हें यह अधिकार न था। इंगलैंड में एक क़ानून है जिसके अनुसार अंग्रेज को अंग्रेज ‘जूरी’ अथवा