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कलम, तलवार और त्याग
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भाग़ लिया और कितने ही भाषण किये। शायद ही कोई ऐसी सभा होती थी जिसमें वह न बोलते हौं। उनकी वक्तृताएँ सदा साफ सुन्क्षीत हुई और न्याय का पक्ष लिये हुए होती थीं। सन् १८८१ ई० में बम्बई के तत्कालीन गवर्नर सर जेम्स फ़र्गोनस ने आपको प्रान्तीय वयवस्थापक सभा का सदस्य मनोनीत किया और आपकी लोकसेवा का क्षेत्र और भी विस्तृत हो गया।

१८८५ ई० मैं इण्डियन नैशनल कांग्रेस का जन्म हुआ। यह शिक्षित और मध्यम वर्गवालों की राजनीतिक संस्था थी, जिसका उद्देश्य राजनीतिक अधिकारों की माँग पेश करना था। बद्रुद्दीन इस संस्था के उत्साही कार्यकर्ता थे, और १८८७ ई० मैं उसके मद्रासवाले अधिवेशन के अध्यक्ष चुने गये। इस अवसर पर उन्होंने जो अभि-भाषण पढ़ा, उसमें ऐसी बहुदर्शिता, ओजस्विता और निर्भीको स्पष्टवादिता का परिचय दिया कि सुननेवाले दंग रह गये। मिस्टर बद्रुद्दीन केवल वचनवीर न थे, ठोस काम में भी वह उसी उत्साह से योग देते थे।

१८७५ ई० मैं सर सैयद अहमद ने अलीगढ़ कालिज' की नींव डाल दी थी; पर मुसलमानों में आमतौर पर उस समय नवीन ज्ञान- विज्ञान की ओर उपेक्षा का भाव था। मिंस्टर बद्रुद्दीन ने दिल खोलकर कालिज को आर्थिक सहायता दी, और मुसलमानों में शिक्षा की उन्नति के लिए सब प्रकार यत्न करते रहे। कांग्रेस में मुसलमानों के सहयोग के सम्बन्ध में सर सैयद अहमद से आपका मतभेद था। सर सैयद का मत था कि मुसलमानों का कांग्रेस में शामिल होना ठीक नहीं है, क्योंकि शिक्षा में वह हिन्दुओं से पीछे हैं और कांग्रेस 'जिन सिद्धान्तों का प्रचार करती थी, उनके विचार से मुसलमानों ने हिन्दुओं की अपेक्षा अधिक हानि होने का डर था। बद्रुद्दीन तैयबजी सैयद अहमद खाँ के इन सिद्धान्तों और विचारों के कट्टर विरोधी थे। इनका मत था कि भारतवासियों को संयुक्त रूप से सरकार के सामने अपनी माँग पेश करनी चादिए। सारांश, इन मतभेदों के रहते