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कलम, तलवार और त्याग
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ताल ठोंककर सामने आयी और दोनो रणबाँकुरे गुथ गये। ऊपर-तले कई बार हुए और राणा घायल होकर पीछे हटा। उसके हटते ही उसकी सेना में खलबली पड़ गई। उनके पाँव उखड़े थे कि मानसिंह की प्रलयङ्करी तलवार ने हजारों को धराशायी बना दिया। उनकी बहादुरी ने आज वह करतब दिखाये कि अच्छे-अच्छे प्रौढ़ मुराल योद्धा जो बाबरी तलवार की काट देखे हुए थे, दाँतों तले उँगली दबा कर रह गये।

इस विजय ने कुँवर मानसिंह के सेनापतित्व की धूम मचा दी और सन् १५८१ ई० में उसकी तलवार ने वह तड़प दिखाई कि 'हिन्दी लोहे ने विलायती के जौहर मिटा दिये। बंगाल में कुछ सरदारों ने सिर उठाया और अकबर के सौतेले भाई मिज़ हकीम को (काबुल से) चढ़ लाने की युक्ति लड़ाना शुरू किया। मिर्जा खुशी से फूला न समाया। अपनी सेना लेकर पंजाब की ओर बढ़ा। इधर से राणा मानसिंह सेनापति बनकर उसके मुकाबिले को रवाना हुआ है मिर्जा का दूधभाई शादमान जो बड़ा वीर और साहसी पुरुष था, अटक का घेरा डाले हुए पड़ा था। नगाड़े की घन-गरज ध्वनि कान में पड़ी तो चौंका। पर अब क्या हो सकती थी, मानसिंह सिर पर आ पहुँचा था। उसकी सेना पलक मारते तितर-बितर हो गई और शादमान धूल में लोटता हुआ दिखाई दिया।

मिर्जा ने यह खबर सुनी तो बड़ा क्रुद्ध हुआ। तुरंत लड़ने को तैयार हो गया और अकबर को बङ्गाल के झमेलों में उलझा हुआ समझ कर लाहौर तक दर्राता हुआ घुस आया। पर ज्यों ही सुना कि अकबर धावा मारे इधर चला आ रहा है, उसके होश उड़ गये। पहाड़ों को फाँदता, नदियों को पार करता काबुल को भागा। मानसिंह भी शाही आदेश के अनुसार पेशावर पर जा पड़ा और काबुल की ओर बढ़ना शुरू किया। अकबर भी अपनी प्रतापी सेना लिये उसके पीछे-पीछे चला।

मानसिंह निश्शंक के घुसता हुआ छोटे काबुल तक जा पहुँचा और