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पृष्ठ:कविता-कौमुदी 1.pdf/१३४

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सूरदास
७९
 

सुनि परमित पिय प्रेम की चातक चितवत पारी।
वन आशा सब दुःख सहै अंत न याचै बारि॥२॥
देखो करनी कमल की कीनों जल सों हेत।
प्राण तज्यो प्रेम न तज्यो सूख्यो सरहिं समेत॥३॥
दीपक पीर न जानई पावक पतन पतंग।
तनु तो तिहि ज्वाला जर्यों चित न भयो रस भंग॥४॥
मीन वियोग न सहि सकै नीर न पूँछै बात।
देखिजु तू ताकी गतिहि रति न घटै नन जात॥५॥
प्रीति परेवा की गनो चाहत चढ़न अकास।
तहँ चढ़ि तीय जु देखिये परत छाँड़ उर स्वाँस॥६॥
सुमर सनेह कुरंग को पवन न राज्यो राग।
धरि न सकत पग पछ मनों सर सनमुख उर लाग॥७॥
सब रस को रस प्रेम है विषयी खेलै सार।
तन, मन, धन, बौवन खिसै तऊ न माने हार॥८॥
तैं जु रत्न पायो भलो जान्यो साधु समाज।
प्रेम कथा अनुदिन सुनी तऊ न उपजी लाज॥९॥
सदा सँघाती आपनो जिय को जीवन प्रान।
सो तू बिसरयो सहज ही हरि ईश्वर भगवान॥१०॥
वेद पुराण स्मृति सबै सुर नर सेवत जाहि।
महामूढ़ अज्ञान मति क्यों न सँभारत ताहि॥११॥
खग मृग मीन पतंग लौं मैं सोधे सब ठौर।
जल थल जीव जिते तिते कहों कहाँ लगि और॥१२॥
प्रभु पूरन पावन सखा प्राणनहू को नाथ।
प्राण दयालु कृपालु प्रभु जीवन जाके हाथ॥१३॥
गर्भवास अति त्रास में जहाँ न एको अंग।
सुनि सठ तेरो प्राणपति वहाँ न छोड्यो संग॥१४॥