सरवर नीर न पीवहीं स्वाति बुँद की आस।
केहरि कबहुँ न तृन चरै जो व्रत करै पचास॥
जो व्रत करै पचास बिपुल गज्जूह बिदारै।
धन ह्वै गर्व न करै निधन नहिं दीन उचारै॥
नरहरि कुल क सुभाव मिटै नहिं जब लग जीवै।
बरु चातक मरि जाय नीर सरवर नहिं पीवै॥७॥
सर सर हंस न होत बाजि गजराज न दर दर।
तर तर सुफर न होत नारि पतिवता न घर घर॥
मन मन सुमति न होत मलैगिर होत न बन बन।
फन फन मनि नहि होत मुक्त जल होत न घन घन॥
रन रन सूर न होत हैं जन जन होत न भक्ति हरि।
नर सुनो सकल नरहरि कहत सब नर होत न एक सरि॥८॥
भूमि परत अवतरत करत बानक बिनोद रस।
पुनि जोबन मदमत्त तत्व इन्द्री अनङ्ग बस॥
विजय हेत जड़ फिरत बहुरि पहुँच्यो बिरधप्पन।
गयो जन्म गुन गनत अन्त कछु भयो न अप्पन॥
थिर रहत न कोउ नरपति न बल रहत एक चहुँ जुग्ग जस।
सुइ अजर अमर नरहरि निरखि पिये भक्ति भगवंत रस॥९॥
कबहुँ द्वार प्रतिहार कबहुँ दर दर फिरंत नर।
कबहुँ देत धन कोटि कबहुँ कर तर करंत कर॥
कबहुँ नृपति मुख चहत कहत करि रहत वचन बस।
कबहुँ दास लघु दास करत उपहास जिभ्य रस।
कछु जानि न संपति गर्ब्बिये विपत्ति न यह उर आनिये।
हिय हारि न मानत सत पुरुष नरहरि हरिहिं सँभारिये॥१०॥
पृष्ठ:कविता-कौमुदी 1.pdf/१४०
दिखावट
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
नरहरि
८५