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पृष्ठ:कविता-कौमुदी 1.pdf/१४३

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कविता-कौमुदी
 


रास पंचाध्यायी और भँवरगीत के कुछ सुन्दर पद हम यहाँ उद्धृत करते हैं—

रास पंचाध्यायी

बन्दन करौं कृपानिधान श्रीसुक सुभकारी।
सुद्ध ज्योतिमय रूप सदा सुन्दर अविकारी॥
हरि लीला रस मत्त मुदित नित विचरत जगमें।
अद्भुत गति कतहूँ न अटक ह्वै निकसत मगमें॥
नीलोत्पलदल श्याम अंग नव जोवन भ्राजै।
कुटिल अलक मुखकमल मनो अलि अवलि विराजै।
ललित बिसाल सुभाल दिपति जनु निकर निसाकर।
कृष्ण भगति प्रतिबन्ध तिमिर कहँ कोटि दिवाकर॥
कृपा रङ्ग रस ऐन नैन राजत रतनारे।
कृष्ण रसासव पान अलस कछु घूम घुमारे॥
श्रवण कृष्ण रसभवन गण्ड मण्डल भल दरसै।
प्रेमानन्द मिलिन्द मन्द मुसुकनि मधु बरसै॥
उश्चत नासा अधर बिम्ब शुक की छबि छीनी।
तिम मह अद्भुत भाँति जु कछुक लसित मसि भीनी॥
कम्बुकण्ठ की रेख देखि हरि धरमु प्रकासै।
काम क्रोध मद लोभ मोह जिहि निरखत नासै॥
उरवर पर अति छबि की भीर कछु वरनि न जाई।
जिद्दि भीतर जगमगत निरन्तर कुँअर कन्हाई॥
सुन्दर उदर उदार रोमावलि राजति भारी।
हियो सरोवर रस भरि चली मनो उमगि पनारी॥
जिहि रस की कुण्डिका नाभि अस शोभित गहरी।
त्रिषली तामइँ ललित भाँति मनु उपजत लहरी॥