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पृष्ठ:कविता-कौमुदी 1.pdf/१४४

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नन्ददास
८९
 

अति सुदेस कटि देस सिंह सोभित सघनन अस।
जोवन मद आकरसत बरसत प्रेम सुधारस॥
गूढ़ जानु आजानु-बाहु मद-गज-गति-लोलैं।
गङ्गादिकन पवित्र करत अवनी पर डोलैं॥
अब दिन मनि श्रीकृष्ण द्रुगन तें दूरि भये दुरि।
पसरि परयौ अंधियार सकल संसार घुमड़ घिरि॥
तिमिर ग्रसित सब लोक ओक लखि दुखित दयाकर।
प्रकट कियो अद्भुत प्रभाव भागवत विभाकर॥
श्रीवृन्दाबन चिदधन कछु छबि बरनि न जाई।
कृष्ण ललित लीला के काज गहि रह्यो न जड़ताई॥
जहँ नग खग मृग लता कुञ्ज बीरुध तृन जेते।
नहिं न काल गुन प्रभा सदा सोभित रहैं तेते॥
सकल जन्तु अविरुद्ध जहाँ हरि मृग सँग चरहीँ।
काम क्रोध मद लोभ रहित लीला अनुसरहीँ॥
सब दिन रहत बसन्त कृष्ण अवलोकनि लोभा।
त्रिभुवन कानन जा विभूति करि सोभित सोभा॥
ज्यों लक्ष्मी निज रूप अनूपम पद सेवति नित।
भू बिलसत जु विभूति जगत जगमग रही जित कित॥
श्री अनन्त महिमा अनन्त को बरनि सकै कवि।
सङ्करषन सो कछुक कही श्रीमुख जाकी छवि॥
देवन में श्री रमारमन नारायन प्रभु जस।
बन में वृन्दावन सुदेस सब दिन सोभित अब।
या बन की बर बानिक या बनही बन आवै।
सेस महेस सुरेस गनेस न पारहिं पावै॥
जहँ जेतिक द्रुमजात कल्पतरु सम सब लायक।
चिन्तामणि सम सकल भूमि चिन्तित फल दायक॥