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पृष्ठ:कविता-कौमुदी 1.pdf/१४५

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कविता-कौमुदी
 

तिम महँ इक जु कल्पतरु लगि रही जगमग ज्योती।
पात मूल फल फूल सकल हीरा मनि मोती॥
तहँ मुतियन के गन्ध लुब्ध अस गान करत अलि।
धर किन्नर गन्धर्व अपच्छर तिन पर गइ बलि॥
अमृत फुही सुख गुही अति सुही परत रहत नित।
रास रसिक सुन्दर पियको स्त्रम दूर करन हित॥
ता सुरतरु महँ और एक अद्भुत छवि छाजै।
साखा दल फल फूलनि हरि प्रतिबिम्ब बिराजै॥
ता तरु कोमल कनक भूमि मनिमय मोहत मन।
दिखियतु सब प्रतिबिम्ब मनौ घर महँ दूसर बन॥
जमुनाजू अति प्रेम भरी नित बहुत सुगहरी।
मनि मण्डित महिमाँह दौरि जनु परसत लहरी॥
तहँ इक मनिमय अङ्क चित्र को सङ्घ सुभग अति।
तापर षोडश दल सरोज अद्भुत चक्राकृति॥
मधि कमनीय करिनिका सब सुख सुन्दर कन्दर।
तहँ राजत बृजराज कुँअर वर रसिक पुरन्दर॥
निकर विभाकर दुति मेंटत सुभ मनि कौस्तुभ अस।
सुन्दर नन्द कुँअर उर पर सोई लागति उडु जस॥
मोहन अद्भुत रूप कहि न आवत छबि ताकी।
अखिल खण्ड व्यापी जु ब्रह्म आभा है जाकी॥
धरमातम परब्रह्म सबन के अन्तरजामी।
नारायन भगवान धरम करि सबके स्वामी॥
बाल कुमर पौगण्ड धरम आक्रान्त ललित तन।
धरमी नित्य किसोर कान्ह मोहत सबको मन॥
अस अद्भुत गोपाल लाल बसत जहँ।
थाही तें बैकुण्ठ विभव कुण्ठित लागत तहँ॥