सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:कविता-कौमुदी 1.pdf/१४६

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
नन्ददास
९१
 

भँवर गीत

ऊर्धव को सील उपदेश सुनो ब्रजनागरी।
रूप सील लावन्य सबै गुन आगरी॥
प्रेम धुजा रस रूपिनी उपजावन सुख पुंज।
सुन्दर स्याम बिलासिनी नच वृन्दाबन कुंज॥
सुनो ब्रजनागरी॥१॥

कहन स्याम सन्देश एक मैं तुम पै आयो।
कहन समै संकेत कहूँ अवसर नाहिँ पायो॥
सोचत ही मन में रख्यों कय पाऊँ इक ठाउँ।
कहि सँदेस नँदलाल को बहुरि मधुपुरी जाउँ॥
सुनो ब्रजनागरी॥२॥

सुनत स्याम को नाम ग्राम गृह की सुधि भूली।
भरि आनँद रस हृदय प्रेम बेली द्रुम फूली॥
पुलकि रोम सब अंग भये भरि आये जल नैन।
कण्ठ घुटे गदगद गिरा बोले जात न बैन॥
व्यवस्था प्रेम की ॥३॥

सुनत सखा के बैन नैन भरि आये दोऊ।
विवस प्रेम आबेस रही नाहीं सुधि कोए॥
रोम रोम प्रति गोपिका ह्वै रही साँवरे गात।
कल्पतरोरुह साँवरो ब्रजवनिता भईं पात।
उलहि अँग अँग तें॥४॥