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पृष्ठ:कविता-कौमुदी 1.pdf/१४७

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कविता-कौमुदी
 

 

तुलसीदास

हिन्दी भाषा के अभूतपूर्व महाकवि गोस्वामी तुलसीदास का जन्म संवत् १५८६ वि॰ में, राजापुर में हुआ। इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे और माता का नाम हुलसी था। इन का पहला नाम रामबोला था। ये सरयूपारीण ब्राह्मण थे।। इनका जन्म दरिद्र कुटुम्ब में हुआ था; जैसा कि इन्होंने कवितावली में "जायो कुल मंगन" आदि स्पष्ट ही लिखा है। इनके गुरु का नाम नरहरिदासजी था। रामायण के प्रारंभ में "बंदउँ गुरु पद कञ्ज, कृपासिन्धु नर रूप हरि" इस सोरटे के "नर रूप हरि" पद से, लोग गुरु का नाम नरहरि निकालते हैं। इनका विवाह दीनबन्धु पाठक की कन्या रत्नावली से हुआ था। स्त्री पर इनका प्रेम अधिक था। एक दिन वह नैहर चली गई। इनसे पत्नी वियोग न सहा गया। ये ससुराल जाकर स्त्री से मिले। स्त्री को लज्जा आई। उसने ये दोहे कहे:—

लाज न लागत आपु को दौरे आयहु साथ।
धिक धिक ऐसे प्रेम को कहा कहौं मैं नाथ॥
अस्थि चरम मय देह मम तामें जैसी प्रीति।
तैसी जो श्री राम महँ होति न तौ भव भीति॥

यह बात गोसाईं जी को ऐसी लगी कि ये वहाँ से उसी समय काशी चले आये और विरक्त हो गये। स्त्री बेचारी को क्या मालूम था कि उसकी साधारण बात का ऐसा परिणाम होगा। उसने बहुत विनती की, और भोजन करने को कहा, परन्तु इन्होंने एक न सुनी। यह घटना तुलसीदास के प्रेम की प्रौढ़ता प्रकट करती है। इनके हृदय में प्रेम का समुद्र