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पृष्ठ:कविता-कौमुदी 1.pdf/१५१

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कविता-कौमुदी
 

पूरा रामचरितमानस पढ़ा जाय। रामचरितमानस के समान भारत में और किसी ग्रन्थ का प्रचार नहीं है।

संवत् १६८० वि॰ श्रावण शुक्ला सप्तमी को तुलसीदास ने असी और गंगा के संगम पर शरीर छोड़ा। उस समय का यह दोहा प्रसिद्ध है—

संवत् सोरह सौ असी असो गंग के तीर।
श्रावण शुक्ला सप्तमी तुलसी तज्यो शरीर॥

मृत्यु के समय गोसाईं जी ने यह दोहा पढ़ा था—

रामनाम जस बरनि कै भयो चहत अब मौन।
तुलसी के मुख दीजिये अबहीं तुलसी सोन॥

राम का विवाह

(रामायण से)

जनम सिंधु पुनि बधु विष दिन मलीन सकलङ्क।
सिय मुख समता पाव किमि चन्द बापुरी रङ्क।

घटइ बढ़इ बिरहिनि दुःखदाई ग्रसइ राहु निज संधिहि पाई
कोक सोकप्रद पङ्कज द्रोही अवगुन बहुत चन्द्रमा तोही
वैदेही मुख पटतर दीन्हे होइ दोष बड़ अनुचित कीन्हें
सियमुखछबि बिधु व्याजवखानो गुरु पहुँ चले निसा बड़िजानी
करि मुनिचरण सरोज प्रनामा आयसु पाइ कीन्ह विश्रामा
बिगत निसा रघुनायक जागे बन्धु विलोकि कहन अस लागे
उदउ अरुन अवलोकहु ताता पङ्कज कोक लोक सुखदाता
बोले लषन जारि जुग पानी भुप्र प्रभावसूचक मृदु बानी

अरुनउदय सकुचे कुमुद उड्डूमन जोति मलीन
जिमि तुम्हार आगमन सुनि भये नृपति बलहीन