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करते हैं, जिनका अर्थ एक है परन्तु विद्वानों और ग्रामीणों के उच्चारण में अंतर है। जैसे—
| शुद्ध शब्द | उच्चारण-भेद | शुद्ध शब्द | उच्चारण-भेद |
|---|---|---|---|
| भूमि | भुई | आकाश | अकास आकास |
| पानीय | पानी | सूर्य | सूरज |
| शरीर | सरीर | श्वास | साँस |
विद्वानों और ग्रामीणों का यह उच्चारण-भेद नया नहीं है, रामायण के समय के भी शिष्ट समाज में बोली जाने वाली भाषा भिन्न थी, और सर्वसाधारण बोलचाल की भाषा भिन्न। बाल्मीकि रामायण सुन्दर काण्ड, सर्ग ३०, श्लोक १७, १९ में अशोकवृक्ष पर हनुमान जी चिंता करते हैं—
अहं ह्यतितनुश्चैव वानरश्च विशेषतः।
वाचं चोदाहरिष्यामि मानुषीमिह संस्कृताम्॥
यदि वाचं प्रदास्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम्।
रावणं मन्यमाना माँ सीता भीता भविष्यति॥
अवश्यमेव वक्तव्यं मानुषं वाक्यमर्थवत्।
अर्थात् मैं तो लघु शरीरी और वानर हूँ। पर यहाँ मनुष्यों की वाणी संस्कृत बोलूँगा। यदि द्विजाति के समान संस्कृत बोलूँगा तो सीता मुझे रावण समझ कर डर जायगी। इसलिये मुझे अर्थयुक्त साधारण मनुष्यों की बोलचाल की भाषा बोलनी चाहिये।
इससे प्रकट होता है कि रामायण के समय में साधारण मनुष्यों की भाषा देववाणी संस्कृत से भिन्न थी। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य संस्कृत बोलते थे और शूद्र संस्कृत शब्दों के अशुद्ध उच्चारण वाली कोई अन्य भाषा। अशोक के शिला लेखों