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पृष्ठ:कविता-कौमुदी 1.pdf/३०

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पता देखकर इतनी बड़ी एक सुसभ्य जाति ने उसे ग्रहण कर लिया? इस प्रश्न का उत्तर देना सहज नहीं।

मेरुतन्त्र में एक स्थान पर "हिन्दू" शब्द आया है। इस सम्बंध के कुछ श्लोक हम यहाँ उद्धृत करते हैं:—

पश्चिमाम्नाय मन्त्रास्तु प्रोक्ताः पारस्य भाषया।
अष्टोत्तर शताशीतिर्येषां संसाधनात्कलौ॥
पञ्चखाना सप्तमीराः नवसाहा महाबलाः।
हिन्दूधर्म प्रलोप्तारो जायन्ते चक्रवर्तिनाः॥
हीनञ्च दूषयेत्येव हिन्दूरित्युच्यते प्रिये।
पूर्वाम्नाये नवशतं षडशीति प्रकीर्तिता॥
फिरङ्ग भाषया मन्त्रा येषां संसाधनात्कलौ।
अधिया मंडलानाञ्च संग्रामेष्वपराजिताः॥
इङ्गरेजा नव षट्पञ्च लण्डजाश्वापि भाविनः।

शिव रहस्य में भी एक स्थान पर ऐसा कहा गया है:—

हिन्दूधर्म प्रलोप्रारो भविष्यन्ति कलीयुगे।

हमें तन्त्र और शिव रहस्य के ये श्लोक पीछे से मिलाये हुये जान पड़ते हैं। क्योंकि पूर्वकाल में यदि हिन्दूधर्म कोई धर्म होता तो उसका उल्लेख स्मृति और पुराणों में कहीं न कहीं अवश्य होना। अतएव हम इन श्लोकों को किसी सुचतुर संस्कृतज्ञ की करामात समझ कर अप्रामाणिक सकते हैं।

हिन्दू शब्द हमें फ़ारसी भाषा में मिलता है। फ़ारसी का एक पथ सुनिये—

अगर आं तुर्क शीराज़ी बदस्त आरद दिले मारा।
बख़ाले हिन्दुवंश बख़शम समरकंदों बुखारारा॥

यह आज से कोई साढ़े पाँच सौ बरस पहले का हाफ़िज़