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पृष्ठ:कविता-कौमुदी 1.pdf/३२

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कितनी ही विदेशी जातियाँ इस देश में भाई और मिल-जुल कर एक हो गई, इसी तरह यह हिन्दू नाम भी विदेश से भाया और यहाँ हमारा हो गया। अतएव हिन्दू नाम को घृणा की दृष्टि से देखने का हमे कोई कारण प्रतीत नहीं होता। यह हिन्दू नाम हमारे और ईरान वासियों के प्राचीन सम्बन्ध की यादगार है।

हम ऊपर लिख आये है कि मुसलमानों ने हमारा नाम हिन्दू नहीं रक्खा, पृथ्वीराज रासो से भी यह प्रमाणित हो सकता है। चंद बरदायी ने रासों से अनेक स्थलों पर हिन्दू और हिन्दुस्थान शब्द लिखे हैं। चंद बरदायी से पहले मुसलमानों को इस देश में आये ही कितने दिन हुए थे कि उनका रखा हुआ नाम एक विशाल जाति में इतना प्रचार पा जाता कि एक बार और स्वजात्याभिमानी कवि अपनी कविता में उस नाम को स्थान देता। स्वदेश और स्वजाति के जिस नाम से समाज अच्छी तरह परिचित रहता है, कवि लोग उनके लिये प्रायः वही नाम अपनी कविता में लिखते हैं। आजकल भी हिन्दी भाषा के कवि अपनी कविता में आवश्यकता पड़ने पर अपने देश का नाम भारत या हिन्दुस्थान ही लिखते हैं। इन्डिया नहीं। अब यह बात ध्यान में आ सकती हैं कि चंद वरदायों से हज़ारों वर्ष पहले, जब कि पृथ्वी मंडल पर मुसलमानों का कहीं अस्तित्व भी नहीं था, हमारी आर्य जाति हिन्दू हिन्दुस्थान नाम को अपना चुकी थी, इसी से चंद कवि को इन शब्दों के बहुल प्रयोग में कोई हिचकिचाहट नहीं हुई।

अब हम हिन्दी भाषा की उत्पत्ति के विषय में विचार करते हैं:—