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गद्य-रचना आसान है, क्योंकि वही प्रतिदिन की बोलचाल है। उसमें उन्नति करना सर्व साधारण के लिये सुगम है।
गद्य की अपेक्षा पद्य में जो विशेषताएँ हैं, संस्कृत-साहित्य में भी उनपर विशेष ध्यान दिया गया है। हाथ मुँह धोने, दातुन करने, बाल सँवारने आदि साधारण कामों की बातें भी मनु आदि ने पद्य में कही हैं। वही क्रम हिन्दी के आदि काल में भी ग्रहण किया गया। उस समय के प्रतिभा सम्पन्न लोगों को जो कुछ कहना हुआ, उन्होंने सब पद्य में कहा। आजकल मनुष्यों के जीवन चरित्र प्रायः गद्य में लिखे जाते हैं, पूर्व काल में पद्य में लिखे जाते थे। इसमें संदेह नहीं कि गद्य की अपेक्षा पद्य में लिखा हुआ जीवन- चरित्र अधिक प्रभावशाली हो सकता है, परन्तु पद्य-रचना का कार्य उतना सुगम नहीं, जितना गद्य का।
हिन्दी-पद्य के विषय में दो एक बातें और कहने की हैं। वे यह हैं कि संस्कृत कविता में जैसा वर्णवृत्तों का प्राधान्य है, वैसा हिन्दी में नहीं। पुराने कवियों में तो शायद ही किसी ने वर्णवृत्तों में कविता की हो। यदि किसी ने की भी हैं, वर्णवृत्त के नियम का उसने अच्छी तरह से पालन नहीं किया है। मात्रिक छंदों में अपने भावों को सरलता पूर्वक वर्णन करने में उसे जैसी सफलता मिली है वैसी वर्णवृत्तों में नहीं। पुराने कवियों के विषय में एक यह बात भी ध्यान देने के योग्य है कि उनमें ऐसे कवियों को संख्या अधिक जिन्होंने अन्य छंदों की अपेक्षा घनाक्षरी और सवैया छंदों में ही अधिक रचना की है। यों तो तुलसी ने दोहे चौपाई में ही सारी राम कथा कह डाली है, बिहारी ने दोहों ही दोहों में रस भरा हैं, चंद और केशव ने विविध छंदों में अपने मनोर