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इस छंद में हिन्दी भाषा की एक स्पष्ट मूर्ति निकल आने में बहुत थोड़ी कसर दिखाई पड़ती है।
सत्रहवीं शताब्दी में सुप्रसिद्ध जैन कवि बनारसीदास हुये। इनका जन्म सं॰ १६४३ में, जौनपुर नगर में हुआ। इन्होंने अपनी कविता में हिन्दी का रूप स्पष्ट कर दिया। इनके नाटक समय सार, अर्द्ध प्रसिद्ध हैं। अर्द्ध कथानक, इनका सबसे अच्छा ग्रंथ है। इसमें इन्होंने अपना ५५ वर्ष का आत्म-चरित लिखा है। इस ग्रंथ से इनकी कविता की थोड़ी सी बानगी आगे दिखलाते हैं:—
सं॰ १६७३ में आगरे में प्लेग का प्रकोप हुआ। उसका वर्णन इन्होंने ऐसा किया है:—
इस ही समय ईति बिस्तरी, परी आगरे पहिली मरी।
जहाँ तहाँ सब भागे लोग, परगट भया गाँठ का रोग।
निकसै गाँठि मरै छिन माँहिँ, काहू की बसाय कछु नाहिं।
चूहे मरैं वैद्य मरि जाहिँ, भयसो लोग अन्ननहिँ खाहिँ।
जब अकबर बादशाह के भरने का समाचार जौनपुर पहुँचा, उस समय वहाँ के निवासियों की क्या दशा हुई, उसका वर्णन सुनिये:—
इसही बीच नगर में सोर भयो उदंगल चारिहु ओर।
घर घर दर दर दिये कपाट हटवानी नहिँ बैठें हाट।
भले वस्त्र अरु भूषन भले ते सब गाड़े धरती तले।
घर घर सबनि बिसाहे सस्त्र लोगन पहिरे मोटे वस्त्र।
ठाढ़ौ कम्बल अथवा खेस नारिन पहिरे मोटे बेस।