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पृष्ठ:कविता-कौमुदी 1.pdf/५०

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गुजरात में गुजराती भाषा के साहित्य का जन्म नरसी मेहता और मीराबाई के समय से हुआ। मीराबाई की जीवनी और कुछ कविता कविता-कौमुदी में दी हुई हैं। उससे यह साफ़ प्रकट होता है कि मीराबाई की कविता की भाषा कैसी है। कहीं कहीं मारवाड़ी और गुजराती बोलचाल के शब्द आ गये हैं नहीं तो वह विशुद्ध हिन्दी ही है। यहाँ हम नरसी मेहता का एक पद लिखते हैं। उससे पाठक आसानी से समझ लेंगे कि गुजराती और हिन्दी में कितना अंतर है।

वैष्णव जन तो तेने कहिये जो पीड़ पराई जाणे रे!
पर दुःखे उपकार करे तोए मन अभिमान न आणे रे॥
सकल लोक माँ सौने बन्दे निन्दा न करे केनी रे।
वाच, काछ, मन निश्चय राखे धन धन जननी तेनी रे॥
सम दृष्टी ने तृष्णा त्यागी पर स्त्री जेने मात रे॥
जिह्वा थकी असत्य न बोले पर धन नव झाले हाथ रे॥
मोह माया व्यापे नहिँ जेने दृढ़ वैराग्य जेना मन माँ रे।
राम नाम सूँ ताली लागी सकल तीरथ तेना तन माँ रे॥
वणलोभी ने कपट रहित छे काम कोध निवार्या रे।
भणे नरसैयों तेनूँ दर्शन करताँ कुल एकोतेर तार्या रे।

बहुत थोड़े शब्द इसमें ऐसे हैं, जो हिन्दी वाले न समझ सकते हों। परन्तु भाव तो सब समझ लेंगे।

नरसी मेहता के पहले गुजरात में गुजराती भाषा बोली तो आती थी किंतु उसका कोई साहित्य नहीं था। ब्रजभाषा की कविता को ही विद्वान और कवि लोग पढ़ते और लिखते थे। गुजराती में ब्रजभाषा का आधिक्य है। इसका एक मुख्य कारण यह है कि वल्लभ सम्प्रदाय का आदर गुजरात में बहुत है। वल्लभ सम्प्रदाय का भक्ति-साहित्य ब्रजभाषा में बहुत