दस पुत्र पुत्रिय एक सम रथ सुरंग उम्मर डमर।
भंडार लछिय अगनित पदम सो पद्म सेन कूँवर सुघर॥३॥
दूहा
पद्म सेन कूँवर सुघर ता घर नारि सुजान।
ता उर एक पुत्री प्रकट मनहुँ कला ससि भान॥४॥
कवित
मनहुँ कला ससि भान कला सोलह सो वन्निय।
बाल बेल ससिता समीप अमृत रस पिनिय॥
बिगसि कमल मृग भ्रमर बैन खंजन मृग लुट्टिय।
हीर कीर अरु बिम्ब मोति नख शिख अहि घुट्टिय॥
छत्रपति गयंद हरि हंस गति विह बनाय संचै सचिय।
पदमिनिय रूप पद्मावतिय मनहु काम कामिनि रचिय॥५॥
दूहा
मनहु काम कामिनि रचिय रचिय रूप की रास।
पशु पंछी सब मोहिनी सुर नर मुनियर पास॥६॥
सामुद्रिक लच्छन सकल चौंसठि कला सुजान।
जानि चतरदस अंग षटरति वसंत परमान॥७॥
सखियन सँग खेलत फिरत महलनि बाग निवास।
कीर इक्क दिष्षिय नयन तब मन भयौं हुलास॥८॥
कवित
मन अति भयौं हुलास बिगसि जनु कोक किरन रवि।
अरुन अधर निय सुधर बिम्ब फल जानि कीर छवि॥
यह चाहत चख चकृत उह जु तक्किय भरप्पि झर।
चंच चहुट्टिय लोभ लियौ तब गहित अप्प कर॥