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पृष्ठ:कविता-कौमुदी 1.pdf/६७

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कविता-कौमुदी
 

कर पकरि पीठ हय पर चढ़ाय,
लै चल्यो नृपति दिल्ली सुराय॥६०॥
भइ खबरि नगर बाहिर सुनाय,
पद्मावतीय हरि लीय जाय॥६१॥
बाजी सुबंध हय गय पलान,
दौरे सुसज्जि दिस्सह दिसान॥६२॥
तुम्ह लेहु लेहु मुख जंपि जोध,
हन्नाह सूर सब पहरि क्रोध॥६३॥
अग्गे जु राज प्रथिराज भूप,
पच्छै सुभयो सब सैन रूप॥६४॥
पहुँचे सु जाय तत्ते तुरंग,
भुअ भिरन भूप जुरि जोध जङ्ग॥६५॥
उलटी जु राज प्रथिराज बाग,
थकि सूर गगन धर धसत नाग॥६६॥
सामंत सूर सब काल रूप,
गहि लोह छोह वाहै सु भूप॥६७॥
कम्मान वान छुट्टहिं अपार,
लागंत लोह इम सारि धार॥६८॥
घमसान धान सब बीर खेत,
घन श्रोन बहत अरु रुकत रेत॥६९॥
मारे बरात के जोध जोह,
परि रुंड मुंड अरि खेत सोह॥७०॥

दूहा

परे रहत रिन स्वेत अरि करि दिल्लिय मुख रुक्ख।
जीति चल्यो प्रथिराज रिन सकल सूर भय सुक्ख॥७१॥