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पृष्ठ:कविता-कौमुदी 1.pdf/७०

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चन्द दबरदाई
१५
 

करी चीह चिक्कार कार कल्प भग्गे,
मदं तंजियं लाज ऊमंग मग्गे॥८८॥
दौरे गजं अंध चहुअन केरो,
करीयं गिरद्दूँ चिहौ चक्क फरों॥८९॥
गिरद्दँ उड़ी भान अंधार रै,
गई सूधि सुज्झैं नहीं मज्झि नैनं॥९०॥
सिरं नाय कम्मान प्रथिराज राजं,
पकरिये साहि जिम कुलिंग बाजं॥९१॥
लैचल्यो सिताबी करी फारि फौंजं,
परे मीर सै पंच तहँ खेत चीजं॥९२॥
रजंपुत्त पच्चास जुज्झे अमोरं,
बजै जीत के नद्द नीसान घोरं॥९३॥

दूहा

जीति भई प्रथिराजकी पकरि साह लै संग।
दिल्ली दिसि मारगि लगौ उतरि घाट गिर गंग॥९४॥
वर गोरी पद्मावती गहि गोरी सुरतान॥
निकट नगर दिल्ली गये प्रथीराज चहुआन॥९४॥

कवित्त

बोलि विप्र सोधे लगन्न सुभ घरी परिट्ठय।
हर बाँसह मंडप बनाय करि भाँवरि गंठिय॥
ब्रह्म वेद उच्चरहिं होम चौरी जु प्रति बर।
पद्मावति दुलहिन दुल्लह प्रथिराज राज नर॥
डंड्यो साह सहाबदी अट्ठ सहस हय वर सुवर।
दै दान मान षट भेस को चढ़े राज दुग्गा हुजर॥९४॥