पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/१०३

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( ८८ ) जालगि केशव भारतभो भुव, पारथ जीवनि बीजु बई जू। सातौ समुद्रनि मुद्रित राम, सो बिप्रन बार अनेक दई जू ॥ केशवदास कहते हैं कि जिस पृथ्वी को हिरण्याक्ष ने हरण किया और जिसे वाराजी ने छीना । जिसके लिए राक्षस, मनुष्य और देवताओ ने अनेक तप किये परन्तु किसी के हाथ की न हुई। जिसके लिए महाभारत का युद्ध हआ जिसने अर्जुन ने जीवो के बीज से बो दिये अर्थात् इतने जीव मारे कि पृथ्वी खेत की तरह हो गई। उस सातो समुदो से युक्त पृथ्वी को परशुराम ने ब्राह्मणो को अनेक बार दान म दिया। श्री रामचन्द्र का दान वर्णन (१) कवित्त पूरन पुराण अरु पुरुष पुराने परि- पूरन बतावै न बतावै और उक्ति को । दरसन देत जिन्हे दरसन रामझै न, नेति नेति कहै वेद छाडि आन युक्ति को । जानि यह केशवदास' अनुदिन राम राम रटत रहत न डरत पुनरुक्ति को। रूप देई अनमाही, गुन देइ गरिमाहि, भक्ति देई महि माहि, नाम देइ मुक्ति को ॥७२॥ सभी पुराण ग्रन्थ और पुराने लोग जिन्हे सब प्रकार से पूर्ण बतलाते है और इस उक्ति को छोड कर कुछ नहीं कहते । जिनके रहस्य को दर्शनशास्त्र भी नहीं जान पाते, वह ( अपने भक्तो को । दर्शन देते हैं। जिनके सम्बन्ध में वेद और कुछ न कह सकने के कारण केवल 'नेति, नेति, अर्थात् ( इनके रहस्य का कोई अन्त नहीं है ) कहा करते हैं। 'केशवदास' कहते है कि यही जान कर ( कि वेद भी उनका रहस्य नहीं बतला सकते) मै दिन प्रति दिन "राम-राम रटता रहता हूँ