पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/११८

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( १०३ ) यह समुद्र है या शकर जी का शरीर है ? क्योकि जिस प्रकार शकर जी के शरीर मे विभूति ( भस्म ), विष ( अमृत ) और पीयू की भूति { अधिकता ) है. उसी प्रकार इसमे भी विभूति (धन-रत्नादि ), पियूष ( अमृत) और विष ( कलाकूट अथवा जल ) का प्राबल्य है। जिस प्रकार शकर जी के दर्शन से पाप दूर होते है, उसी प्रकार इससे भी पापो का छेदन होता है। 'केशवदास' कहते हैं कि यह कश्यप का घर है, क्योकि जैसे उनके घर मे देवता और राक्षस रहते हैं, वैसे इसमें भी रहते है । अथवा यह सन्तो का हृदय है क्योकि उनके हृदयो में सदाहरि बसते हैं और इसके हृदय मे भी सदाहरि का निवास रहता है । अत इस समुद्र को ऐसी अनन्त शोभा है कि ऐसा कौन कवि है जो उसका वर्णन कर सके । थवा यह समुद्र है या कोई नागर पुरुष (नगर निवासी व्यक्ति ) है क्योकि जैसे उसका शरीर चन्दन की तरग से तरगित ( सुगव से सुगधित ) रहता है, वैसे इसका शरीर भी उस चन्दन से युक्त रहता है जो व्यापारी लोग पहाड से काट-काट कर इसके जल द्वारा बहा ले जाया करते है। अथ सूर्योदय वर्णन दोहा सूर उदयते अरुणना, पय पावनता होइ । शख वेदधुनि मुनि करें, पंथ चलै सबकोइ ।।२२।। कोक कोकनद शोकहर, दुख कुबलय कुलटानि। तारा, औषधि, दीप, शशि, घुघू चोर तमाहानि ॥२३॥ सूर्योदय होने पर अरुणता ( लालिमा ) और पय ( जल ) की पवित्रता होती है। मुनि लोग वेद-ध्वनि करने लगते हैं और सब लोग मार्ग पर चलना आरम्भ करते हैं । कोक चक्रवाक पक्षी) और कोकनद (कमल) का दुख दूर हो जाता है, कुमुदिनी और कुलटास्त्रियों को दुख होता है। तारा, औषधि, दीपक, चन्द्रमा, उल्लू, चोर तथा अन्धकार की हानि होती है।