पृष्ठ:कवि-प्रिया.djvu/१२२

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( १०७ ) उदाहरण कवित्त शीतल समीर शुभ गङ्गा के तरंग युत, अवर विहीन वपु वासुकी लसंत है। सेवत मधुपगण गजमुख परभृत, बोल सुन होत सुखी सत और असंत है । अमल अदल रूप मञ्जरी सुपद रज, रञ्जित अशोक दुख देखत नसंत है। जाके राज दिसि दिसि फूले हैं सुमन सब, शिव को समाज किधौं केशव वसंत है ॥२८॥ 'केशवदास' कहते हैं कि शिवजी का समाज है या वसंत ऋतु है ? शिवजी के समाज मे जिस प्रकार पवित्र गङ्गाजी की लहरो से युक्त शीतल समीर (ठन्डी वायु) बहा करती है । वह स्वय अवरविहीन वपु (वस्त्र रहित शरीर वाले) है और उनके शरीर पर वासुको ( सॉप ) सुशोभित रहते हैं । मधुप (देवता), गजमुख (श्रीगणेश ) और परभृत ( षटमुख- सोमकार्तिकेय ) उनकी सेवा करते हैं, जिनकी वाणी को सुनकर सन्त और असन्त ( रावण जैसे ) सुखी होते हैं। वहाँ अमल निर्मल चरित्र वाला) अदल ( अपर्णा-पार्वतीजी ) जैसी रूपमञ्जरी ( सुन्दरी) के सुपदो की रज (धूल ) से लोग अशोक (शोकरहित ) हो जाते हैं, क्योकि उन चरणो के देखते ही दुःख नष्ट हो जाते हैं। वहां-शिवजी के राज्य मे-दिशाओ-दिशाओ के सुमन ( देवतामण । फूले प्रसन्न रहते है। उसी प्रकार- वसत मे गगाजी की लहरो के स्पर्श से युक्त हो शीतल समीर बहा करती है । अबर (आकाश), विहीनवपु (कामदेव ) और बासुकी (पुष्प हार ) सुशोभित होते है । गजमुख, अर्थात् हाथियों के मन की सेवा मधुपगण ( भौरे ) किया करते हैं, क्योकि वसंत मे ही हाथी